पूविवि में पीएचडी प्रवेश घोटाले पर उठे सवाल
PUCRET-2024 की प्रक्रिया पर शोधार्थी ने खड़े किये प्रश्नकुलाधिपति/राज्यपाल से हस्तक्षेप करने की उठी मांग
शैक्षणिक गतिविधियों को तत्काल प्रभाव से रोका जाय
सरायख्वाजा, जौनपुर। वीर बहादुर सिंह पूर्वांचल विश्वविद्यालय में पीएचडी प्रवेश परीक्षा PUCRET-2024 को लेकर विवाद लगातार गहराता जा रहा है। शोधार्थी अजय मौर्य ने कुलाधिपति एवं उत्तर प्रदेश के राज्यपाल से तत्काल हस्तक्षेप की मांग करते हुये आरोप लगाया कि विश्वविद्यालय में पीएचडी प्रवेश प्रक्रिया के नाम पर नियमों, सूचना विवरणिका और आरक्षण व्यवस्था की खुलेआम अनदेखी की गयी है। यदि सम्पूर्ण PUCRET-2024, डीआरसी (Departmental Research Committee) एवं आरडीसी (Research Degree Committee) की स्वतंत्र जांच करायी जाय तो विश्वविद्यालय के इतिहास का एक बड़ा प्रवेश घोटाला सामने आ सकता है।
अजय मौर्य का कहना है कि विश्वविद्यालय द्वारा एक ही विज्ञापन, एक ही सूचना विवरणिका और एक ही पीएचडी ऑर्डिनेंस के आधार पर प्रवेश प्रक्रिया संचालित की जानी थी लेकिन वास्तविकता इसके बिल्कुल विपरीत रही। विभिन्न विभागों सहित सम्बद्ध महाविद्यालयों में डीआरसी की प्रक्रिया अलग-अलग नियमों से करायी गयी। कहीं प्रवेश परीक्षा में प्राप्त अंकों के 70 प्रतिशत भारांक के आधार पर मेरिट बनायी गयी तो कहीं 140 अंकों की प्रवेश परीक्षा में प्राप्त वास्तविक अंकों को दरकिनार कर सभी अभ्यर्थियों को सीधे 70 अंक प्रदान कर दिये गये। कई स्थानों पर प्रस्तुतीकरण और साक्षात्कार के अंक निर्धारण की प्रक्रिया भी अलग-अलग रही। ऐसे में सवाल यह है कि जब विज्ञापन, सूचना विवरणिका और विश्वविद्यालय के नियम समान थे तो अलग-अलग विभागों ने अलग-अलग मानक अपनाने का अधिकार किस आधार पर प्राप्त किया?
उन्होंने आरोप लगाया कि कम्प्यूटर एप्लीकेशन विभाग में वे पिछड़ा वर्ग (OBC) की विभागीय मेरिट सूची में दूसरे स्थान पर थे लेकिन उन्हें प्रवेश से वंचित कर दिया गया जबकि उनसे नीचे मेरिट रखने वाले 6 अभ्यर्थियों को प्रवेश प्रदान कर दिया गया। इतना ही नहीं, आरडीसी की कार्यवाही में उनका नाम सम्मिलित किया गया। शोध निर्देशक का आवंटन भी हुआ किन्तु बाद में बिना किसी आदेश, सूचना या संशोधित सूची के उनका नाम हटा दिया गया। यह पूरी प्रक्रिया प्राकृतिक न्याय और प्रशासनिक पारदर्शिता के सिद्धांतों के विपरीत है।
अजय मौर्य ने यह भी आरोप लगाया कि आरक्षण नियमों का पालन नहीं किया गया। कुछ अभ्यर्थियों की श्रेणी में मनमाने ढंग से परिवर्तन किये गये महेश विश्वकर्मा को पहले अनारक्षित श्रेणी में दर्शाया गया और बाद में बिना किसी सार्वजनिक संशोधित आदेश के पिछड़ा वर्ग श्रेणी में समायोजित कर दिया गया। वहीं मेरिट में ऊपर होने के बावजूद उन्हें बाहर कर दिया गया। इससे चयन प्रक्रिया की निष्पक्षता और वैधता दोनों पर गम्भीर प्रश्न खड़े होते हैं।
उन्होंने दावा किया कि कई विभागों में शोध निर्देशकों द्वारा निर्धारित क्षमता एवं अनुमन्य सीटों से अधिक अभ्यर्थियों को प्रवेश देने की कोशिश की गयी है। यदि सभी विभागों और महाविद्यालयों की डीआरसी एवं आरडीसी कार्यवाहियों की जांच करायी जाय तो व्यापक स्तर पर अनियमितताएं उजागर हो सकती हैं। उनका कहना है कि यह मामला केवल एक विभाग तक सीमित नहीं है, बल्कि सम्पूर्ण PUCRET-2024 की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लगाता है।
इस बाबत पूछे जाने पर अजय मौर्य ने बताया कि उन्होंने मुख्यमंत्री जनसुनवाई पोर्टल (आईजीआरएस) पर भी शिकायत दर्ज करायी थी तथा शिकायत के साथ मेरिट सूची, चयन सूची, सूचना विवरणिका सहित अन्य दस्तावेजी साक्ष्य भी संलग्न किये थे। इसके बावजूद विश्वविद्यालय प्रशासन ने शिकायत में उठाये गये किसी भी बिन्दु का तथ्यात्मक और बिन्दुवार उत्तर देने के बजाय केवल यह लिखकर प्रकरण का निस्तारण कर दिया कि “पीएचडी प्रवेश प्रक्रिया एवं पीएचडी ऑर्डिनेंस-2022 के अनुरूप सम्पन्न हुई है।” उनका कहना है कि विवि प्रशासन द्वारा आरोपों का खण्डन करने के बजाय औपचारिक जवाब देकर मामले को दबाने का प्रयास किया गया है।
शोधार्थी ने कहा कि धारा-68 के अन्तर्गत कुलाधिपति के समक्ष विस्तृत प्रतिवेदन पहले ही प्रस्तुत किया जा चुका है। ऐसे में जब तक इस प्रकरण की जांच पूरी नहीं हो जाती और अंतिम निर्णय नहीं आ जाता तब तक सम्बन्धित पीएचडी बैच के कोर्सवर्क सहित अन्य शैक्षणिक गतिविधियों को तत्काल प्रभाव से रोका जाना चाहिये। उन्होंने कुलाधिपति/राज्यपाल से छात्रहित में त्वरित हस्तक्षेप कर सम्पूर्ण PUCRET-2024, डीआरसी एवं आरडीसी प्रक्रिया की उच्चस्तरीय जांच कराने तथा दोषी पाये जाने पर पूरी चयन प्रक्रिया निरस्त कर नये सिरे से पारदर्शी प्रवेश कराने की मांग किया है।
वहीं इस संदर्भ में जानकारी लेने के लिये सम्बन्धित विभागाध्यक्ष प्रो. सुरजीत यादव से दूरभाष के माध्यम से सम्पर्क करने का प्रयास असफल रहा।
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